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jalvayu parivartan

Jalvayu Parivartan

 

मौसम लगातार बदलता रहता है, इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती है। और यह मानकर चलना चाहिए कि यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बात की संभावना बहुत ज़्यादा है कि बीसेक सालों के बाद रूस में गेहूँ के खेतों की जगह संतरों और मौसम्मियों के बाग लगे दिखाई देंगे। कृषि क्षेत्र के विकास में मौसम में अप्रत्याशित बदलाव सैद्धान्तिक महत्त्व रखता है। और विज्ञान को कुछ ऐसा करना है कि विज्ञान जलवायु सम्बन्धी बदलावों की दीर्घकालीन भविष्यवाणी कर सके।

जैसे विज्ञान कहता है कि आपके इलाके में तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा। सूचना का उपभोग करने वाला कृषक वर्ग पूछता है कि इसका क्या मतलब है? इसके कुपरिणामों से बचने की क्या क़ीमत चुकानी होगी? और इन सवालों का जलवायु विज्ञान कोई उत्तर नहीं दे पाता क्योंकि वह जलवायु में होने वाले बदलाव का आर्थिक मूल्यांकन करने में असमर्थ है। इसलिए इन दोनों के बीच आपसी सम्पर्क और संचार की एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जो दोनों के बीच होनेवाली बातचीत को सही अर्थ दे सके यानी जिसके बनने के बाद ये दोनों एक-दूसरे से उस भाषा में बात कर सकेंगे, जो दोनो की समझ में आएगी।

कृषि-क्षेत्र में सामने आने वाले जोख़िमों का ठीक-ठीक हिसाब लगाने के लिए जलवायु में सामने आने वाली असंगतियों और अप्रत्याशित बदलावों के बारे में जानना बेहद ज़रूरी है क्योंकि इन असंगतियों की वज़ह से ही हर साल मौसम बदलता रहता है। व्लदीमित कात्स्व ने कहा :

मौसम के हिसाब से फ़सल बदलना एक गम्भीर क़दम होगा, जिसमें भारी पूँजी निवेश की भी ज़रूरत होगी। उन जगहों पर कम पानी की ज़रूरत वाली वह फ़सल बोनी होगी, जहाँ अक्सर सूखा पड़ने की संभावना होती है। या फिर यदि किसी जगह पर औसत तापमान बढ़ रहा है तो वहाँ वे फ़सलें बोई जा सकेंगी, जिन्हें ज़्यादा गर्म मौसम की ज़रूरत होती है। दर‍असल यह एक ऐसी रणनीतिक योजना है, जो राजनीतिक स्तर पर उन लोगों के द्वारा तय की जाती है, जो क्षेत्रीय या शाखाई विकास की योजनाएँ बनाते हैं।

विगत 2009 में ही जलवायु विशेषज्ञों ने ऐसी भूमंडलीय व्यवस्था बनाने का निश्चय किया था जो कृषि क्षेत्र को और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों को जलवायु सम्बन्धी जानकारियाँ दे सके। अब सेंट पीटर्सबर्ग में एशियाई प्रशान्त महासागरीय आर्थिक सहयोग संगठन द्वारा आयोजित जलवायु परिसंवाद में इस बात पर चर्चा की जानी चाहिए कि ऐसी सूचना व्यवस्था का निर्माण कैसे किया जाए। सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित जलवायु सम्मेलन के सहभागियों का मानना है कि वह सब-कुछ किया जाना चाहिए कि प्राकृतिक विपत्तियों की वज़ह से पृथ्वी पर खाद्य-संकट पैदा न हो।